नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों की यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के निवारण के लिए बनेंगे नियम

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों की यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के निवारण को लेकर महत्वपूर्ण दिशा में पहल करते हुए केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) से देशभर की अदालतों और न्यायिक-अर्धन्यायिक संस्थाओं के लिए एक समान नियम तैयार करने को कहा है. कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट, जिला और तालुका अदालतों के साथ-साथ केंद्र एवं राज्य सरकारों के ट्रिब्यूनल तथा अन्य अर्धन्यायिक प्राधिकरणों में प्रैक्टिस करने वाली महिला वकीलों की शिकायतों के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी है.

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के समक्ष “Seema Joshi v. Bar Council of India and Ors.”, रिट याचिका (सिविल) नंबर 805/2025 की सुनवाई हुई. अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट में लागू 2013 के जेंडर सेंसिटाइजेशन और यौन उत्पीड़न संबंधी नियम विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट परिसर के लिए बनाए गए हैं. अब इसी तरह की व्यवस्था देश के अन्य न्यायिक और अर्धन्यायिक परिसरों में लागू करने के लिए अलग नियमों की जरूरत है.

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकथाम, निषेध और निवारण अधिनियम, 2013 यानी पीओएसएच कानून को कानूनी पेशे से जुड़ी महिलाओं पर एक ही तरह के ढांचे में लागू नहीं किया जा सकता. अदालत के अनुसार वकीलों की पेशेवर स्थिति पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध से अलग होती है. ऐसे में शिकायतों के निवारण के लिए कानूनी पेशे की परिस्थितियों के अनुरूप अलग संस्थागत व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है.

पीठ ने संबंधित पक्षों के वकीलों से आपसी विचार-विमर्श कर ऐसा नियमों का सेट तैयार करने को कहा, जो हाईकोर्ट, जिला न्यायपालिका, तालुका अदालतों, ट्रिब्यूनल और अन्य अर्धन्यायिक संस्थाओं में लागू हो सके.

सुप्रीम कोर्ट के 2013 के नियमों को बनाया आधार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने यहां लागू ‘जेंडर सेंसिटाइजेशन एंड सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वूमेन एट द सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल रेगुलेशंस, 2013’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इन नियमों में सुप्रीम कोर्ट परिसर में महिला वकीलों के लिए शिकायत निवारण की व्यवस्था मौजूद है.

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