आपसी सहमति से तलाक के लिए निर्धारित छह महीने की कूलिंग पीरियड अवधि हर मामले में अनिवार्य नहीं : हाईकोर्ट

इंदौर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आपसी सहमति से तलाक के एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए निर्धारित छह महीने की कूलिंग पीरियड अवधि हर मामले में अनिवार्य नहीं मानी जा सकती. यदि पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हों और उनके बीच सुलह की संभावना पूरी तरह समाप्त हो चुकी हो, तो अदालत परिस्थितियों को देखते हुए इस प्रतीक्षा अवधि को समाप्त करने के आवेदन पर विचार कर सकती है. हालांकि, हाई कोर्ट ने खुद छह महीने की अवधि खत्म करने का आदेश नहीं दिया है. उसने कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें कूलिंग पीरियड खत्म करने का आवेदन खारिज किया गया था और 15 दिन के भीतर मामले पर नए सिरे से निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं.

अप्रैल 2025 से अलग रह रहे थे पति-पत्नी
मामला ऐसे दंपती से जुड़ा है जो वैवाहिक विवाद के बाद अप्रैल 2025 से अलग-अलग रह रहे हैं. दोनों ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए कुटुंब न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया था. पति की ओर से इसी के साथ एक अलग आवेदन भी दिया गया, जिसमें कहा गया कि दोनों के बीच अब सुलह की कोई संभावना नहीं बची है. ऐसे में छह महीने की प्रतीक्षा अवधि समाप्त कर आपसी सहमति से तलाक के आवेदन पर जल्द निर्णय किया जाना चाहिए.

पति का तर्क था कि जब दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हैं और वैवाहिक संबंध को आगे जारी रखने की स्थिति नहीं है, तो केवल निर्धारित छह महीने की अवधि पूरी करने के लिए मामले को लंबा खींचने का कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं है.

हालांकि, कुटुंब न्यायालय ने कूलिंग पीरियड समाप्त करने से इनकार कर दिया. इसके बाद पति ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए कुटुंब न्यायालय के आदेश को चुनौती दी.

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