तलाकशुदा बेटी भी परिवार का हिस्सा, फैमिली पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता : हाईकोर्ट

जबलपुर. मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि तलाकशुदा बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं रखा जा सकता और उसे केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर फैमिली पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. न्यायालय ने कहा कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा. इसके साथ ही कोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्धारित समय-सीमा में याचिकाकर्ता को फैमिली पेंशन का लाभ प्रदान करने के निर्देश दिए हैं.

मामले की सुनवाई हाई कोर्ट की एकलपीठ में न्यायमूर्ति विशाल धगट ने की. याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी ज्योति श्रीवास्तव की ओर से प्रस्तुत याचिका में बताया गया कि उनके पिता शंकर लाल श्रीवास्तव होमगार्ड विभाग में जिला कमांडेंट के पद पर कार्यरत थे और वर्ष 2001 में सेवानिवृत्त हुए थे. सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपनी तलाकशुदा बेटी ज्योति श्रीवास्तव को फैमिली पेंशन के लिए नामांकित किया था, क्योंकि वह उन पर आश्रित थीं.

पिता के निधन के बाद जब फैमिली पेंशन का लाभ देने का मामला सामने आया तो संबंधित विभाग ने आवेदन निरस्त कर दिया. विभाग का तर्क था कि तलाकशुदा बेटी को परिवार की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है, इसलिए उसे फैमिली पेंशन का लाभ नहीं दिया जा सकता. विभाग के इस निर्णय को चुनौती देते हुए ज्योति श्रीवास्तव ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी.

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पेंशन नियम 1976 का परीक्षण किया. कोर्ट ने पाया कि नियमों में अविवाहित, विधवा और विवाहित बेटियों को परिवार का सदस्य माना गया है. ऐसे में केवल तलाकशुदा बेटी को इस श्रेणी से बाहर रखना तर्कसंगत नहीं माना जा सकता. न्यायालय ने कहा कि यदि अन्य सभी श्रेणी की बेटियों को परिवार का सदस्य स्वीकार किया जाता है तो तलाकशुदा बेटी को अधिकारों से वंचित करना समानता के सिद्धांत के विपरीत होगा.

अपने आदेश में कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून और नियमों की व्याख्या सामाजिक वास्तविकताओं तथा संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप की जानी चाहिए. वर्तमान समय में बड़ी संख्या में महिलाएं विवाह विच्छेद के बाद अपने माता-पिता या मायके पर आश्रित रहती हैं. ऐसी परिस्थितियों में केवल नियमों में स्पष्ट उल्लेख न होने के आधार पर उन्हें सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता.

न्यायालय ने माना कि तलाकशुदा महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्हें परिवार के सदस्य के रूप में मान्यता देना आवश्यक है. कोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली पेंशन का उद्देश्य आश्रित परिवारजनों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है और इस उद्देश्य की पूर्ति में किसी प्रकार का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जा सकता.

महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए हाई कोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता ज्योति श्रीवास्तव को नियमानुसार फैमिली पेंशन का लाभ प्रदान किया जाए. न्यायालय का यह फैसला न केवल याचिकाकर्ता के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण कानूनी नजीर माना जा रहा है, जहां तलाकशुदा बेटियों के अधिकारों का प्रश्न सामने आता है.

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