प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर किसी प्रत्यक्षदर्शी गवाह की गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता कि उसके हस्ताक्षर पंचनामा रिपोर्ट या अन्य पुलिस दस्तावेजों पर मौजूद नहीं हैं. अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए वर्ष 1998 के चर्चित हत्या मामले में दोषी करार दिए गए आरोपी की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा और उसकी अपील खारिज कर दी.
न्यायमूर्ति सलील कुमार राय और न्यायमूर्ति अजय कुमार-द्वितीय की खंडपीठ ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 174 के तहत तैयार किए जाने वाले पंचनामा का उद्देश्य केवल मृत्यु के कारणों और परिस्थितियों का प्रारंभिक पता लगाना होता है. कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि पंचनामा रिपोर्ट में प्राथमिकी का विवरण, आरोपियों के नाम, प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के नाम अथवा उनके हस्ताक्षर अनिवार्य रूप से दर्ज किए जाएं.
मामला वर्ष 1998 में हुई एक दिनदहाड़े हत्या से जुड़ा है. अभियोजन के अनुसार मृतक जगपाल सिंह के परिवार और आरोपियों के परिवार के बीच लंबे समय से भूमि विवाद चला आ रहा था. न्यायालयी प्रक्रिया के बाद मृतक के पिता महीपाल सिंह ने विवादित भूमि प्राप्त कर ली थी, जिसके कारण दोनों पक्षों के बीच गहरी रंजिश पैदा हो गई थी.
अभियोजन के अनुसार 10 अप्रैल 1998 को जगपाल सिंह अपने बहनोई के साथ साइकिल से वकील से मिलने जा रहे थे. इसी दौरान रास्ते में चार लोगों ने उन पर हमला कर दिया. आरोप है कि पहले लाठियों से मारपीट की गई और बाद में तमंचों तथा चाकुओं से हमला कर उनकी हत्या कर दी गई. मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने सभी आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.
अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृतक के पिता और बहनोई घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे, क्योंकि उनके हस्ताक्षर पंचनामा और बरामदगी संबंधी दस्तावेजों में नहीं हैं. हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि किसी गवाह का नाम या हस्ताक्षर पंचनामा रिपोर्ट में न होना उसकी गवाही को अविश्वसनीय नहीं बनाता.
अदालत ने यह भी कहा कि जब किसी मामले में विश्वसनीय प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य उपलब्ध हों, तब अभियोजन के लिए हत्या का उद्देश्य अलग से सिद्ध करना आवश्यक नहीं होता. न्यायालय ने टिप्पणी की कि उद्देश्य का महत्व मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों वाले मामलों में होता है, जबकि प्रत्यक्षदर्शी गवाही अदालत का विश्वास जीत ले तो उद्देश्य साबित न होने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं पड़ता.
एक अन्य दलील में बचाव पक्ष ने कहा कि अभियोजन ने एक अन्य नामित गवाह को पेश नहीं किया, इसलिए उसके विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए. इस तर्क को भी अदालत ने अस्वीकार कर दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में किसी अपराध को सिद्ध करने के लिए गवाहों की कोई निश्चित संख्या निर्धारित नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि प्रस्तुत गवाही कितनी विश्वसनीय और भरोसेमंद है.
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि मृतक के पिता और बहनोई की गवाही सुसंगत, विश्वसनीय और घटनास्थल पर उनकी उपस्थिति को प्रमाणित करने वाली है. इसी आधार पर अदालत ने आरोपी प्रवेश की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा.









