राजीव रंजन श्रीवास्तव, सागर
लाल रंग का वह लेटर बॉक्स… जो कभी भाई-बहन के स्नेह का सबसे भरोसेमंद जरिया हुआ करता था, अब अपनी पहचान खोता जा रहा है। सावन का महीना शुरू हो चुका है और रक्षाबंधन नजदीक है, लेकिन शहर के डाकघरों और प्रमुख चौराहों पर लगे अधिकांश लेटर बॉक्स सूने पड़े हैं।
एक समय था, जब इन्हीं बॉक्स में डाली गई राखियां, खत और शुभकामना पत्र सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे भाइयों तक बहनों का स्नेह पहुंचाते थे। अब उनकी जगह मोबाइल स्क्रीन, व्हाट्सएप, वीडियो कॉल और ऑनलाइन गिफ्ट डिलीवरी ने ले ली है।
करीब एक-दो दशक पहले रक्षाबंधन से पहले डाकघरों में सुबह से शाम तक चहल-पहल रहती थी। बहनें राखी, चिट्ठी और ग्रीटिंग कार्ड लेकर पहुंचती थीं। लेटर बॉक्स जल्दी भर जाते थे और डाक कर्मचारी उन्हें दिन में कई बार खाली करते थे। अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। कई लेटर बॉक्स पूरे दिन में मुश्किल से कुछ ही पत्र निगल पाते हैं।
यह सिर्फ लेटर बॉक्स के सूने होने की कहानी नहीं, बल्कि बदलते दौर में रिश्तों को जताने के तरीके बदलने की तस्वीर भी है। तकनीक ने दूरियां जरूर मिटाई हैं, लेकिन हाथ से लिखे खत और डाक से पहुंची राखी का इंतजार, वह उत्साह और अपनापन आज भी किसी मोबाइल नोटिफिकेशन से बड़ा महसूस होता है।
डाक विभाग के कर्मचारियों का कहना है कि पहले रक्षाबंधन के सीजन में डाक का दबाव इतना बढ़ जाता था कि अतिरिक्त कर्मचारियों की व्यवस्था करनी पड़ती थी। अब व्यक्तिगत पत्रों की संख्या लगातार घट रही है। राखियों की बुकिंग का बड़ा हिस्सा भी स्पीड पोस्ट और कूरियर की ओर शिफ्ट हो गया है।
हालांकि आधुनिक संचार क्रांति ने भले ही लेटर बॉक्स की उपयोगिता कम कर दी हो, लेकिन विश्वसनीयता आज भी बरकरार है।
भावनाएं स्क्रीन पर सिमटीं
पहले बहनें राखी के साथ हाथ से लिखा खत भी भेजती थीं। भाई कई बार उन खतों को वर्षों तक संभालकर रखते थे। अब हैप्पी रक्षाबंधन का संदेश कुछ सेकंड में मोबाइल पर पहुंच जाता है, लेकिन हाथ से लिखे शब्दों की आत्मीयता कहीं पीछे छूट गई है।
नई पीढ़ी ने बदला तरीका
ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म पर सीधे भाई के पते पर राखी भेजने की सुविधा, डिजिटल भुगतान, वीडियो कॉल और सोशल मीडिया ने पारंपरिक डाक व्यवस्था की जरूरत कम कर दी है। सुविधा बढ़ी है, लेकिन लेटर बॉक्स से जुड़ी भावनात्मक यादें भी धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही हैं।


