जबलपुर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि कानून की व्याख्या केवल तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की भावना के अनुरूप की जानी चाहिए. अदालत ने कहा कि यदि कोई महिला लंबे समय तक किसी पुरुष के साथ पत्नी की तरह रही हो और उनके संबंध से संतान का जन्म हुआ हो, तो केवल विवाह की वैधानिकता के आधार पर उसके भरण-पोषण के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता. इसी टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने उमरिया स्थित फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर मामले की नए सिरे से सुनवाई के निर्देश दिए हैं.
न्यायमूर्ति द्वारकाधीश बंसल की एकलपीठ ने यह आदेश रामकली कुशवाहा द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया. याचिकाकर्ता ने फैमिली कोर्ट के 25 जून 2019 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें विधिक पत्नी नहीं मानते हुए भरण-पोषण का दावा खारिज कर दिया गया था. हालांकि अदालत ने दोनों पक्षों की नाबालिग पुत्री कु. शिवानी कुशवाहा के लिए दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश यथावत रखा था.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुशील कुमार तिवारी, शांतनु तिवारी और अंजलि मेहरा ने पक्ष रखा. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 में दिए गए एन. उषा रानी बनाम मूडुदुला श्रीनिवास मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भरण-पोषण संबंधी मामलों में “पत्नी” शब्द की व्याख्या सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप व्यापक रूप से की जानी चाहिए. उनका तर्क था कि यदि महिला लंबे समय तक पत्नी के रूप में रही है और समाज में उसी रूप में स्वीकार की गई है, तो उसके अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती.
हाई कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए पाया कि महिला और प्रतिवादी मनोज कुशवाहा लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे तथा उनके संबंध से एक पुत्री का जन्म भी हुआ. अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 का मूल उद्देश्य परित्यक्त महिलाओं और बच्चों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है. इसलिए ऐसे मामलों में केवल विवाह की तकनीकी वैधता पर ध्यान देने के बजाय संबंधों की वास्तविकता, साथ रहने की अवधि और उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है.
अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी महिला ने लंबे समय तक वैवाहिक जीवन जैसा संबंध निभाया है, तो उसे केवल कानूनी तकनीकी आधार पर संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता. न्यायालय ने माना कि सामाजिक न्याय की अवधारणा ऐसे मामलों में व्यापक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की अपेक्षा करती है.


