स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की अविवाहित दिव्यांग बेटी को पेंशन का अधिकार, हाईकोर्ट ने 14 साल पुराना आदेश रद्द किया

जबलपुर. मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की अविवाहित एवं आश्रित दिव्यांग पुत्री भी वर्ष 1972 के नियमों के तहत सम्मान निधि (पेंशन) पाने की हकदार है. अदालत ने यह भी कहा कि राज्य शासन केवल किसी परिपत्र के आधार पर किसी नागरिक को उसके वैधानिक अधिकार से वंचित नहीं कर सकता. हाई कोर्ट ने छतरपुर निवासी कु. बबीता खत्री की याचिका स्वीकार करते हुए 18 दिसंबर 2012 को जारी पेंशन अस्वीकृति आदेश को निरस्त कर दिया और राज्य सरकार को बकाया राशि सहित नियमित पेंशन देने के निर्देश दिए हैं.

जबलपुर स्थित हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति मनिंदर सिंह भट्टी की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मध्यप्रदेश स्वतंत्रता संग्राम सैनिक सम्मान निधि नियम, 1972 में परिवार की परिभाषा के अंतर्गत अविवाहित पुत्री को शामिल किया गया है. ऐसे में कार्यपालिका द्वारा जारी कोई भी परिपत्र इन वैधानिक नियमों को समाप्त या सीमित नहीं कर सकता. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2004 का परिपत्र वर्ष 1972 के नियमों पर प्रभावी नहीं हो सकता और न ही उसके आधार पर किसी पात्र व्यक्ति का अधिकार छीना जा सकता है.

याचिकाकर्ता कु. बबीता खत्री की ओर से अधिवक्ता सुधा गौतम ने पक्ष रखा, जबकि राज्य शासन की ओर से पैनल अधिवक्ता अंकिता खरे उपस्थित हुईं. याचिका में बताया गया कि बबीता खत्री 75 प्रतिशत दिव्यांग हैं और अपने माता-पिता पर आश्रित थीं. उनकी माता, जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पत्नी थीं, के निधन के बाद उन्हें मिलने वाली सम्मान निधि बंद कर दी गई. इसके बाद उन्होंने पेंशन जारी रखने के लिए आवेदन किया, जिसका समर्थन छतरपुर कलेक्टर ने भी अपनी अनुशंसा के माध्यम से किया था. इसके बावजूद राज्य शासन ने वर्ष 2004 के एक परिपत्र का हवाला देते हुए उनका दावा खारिज कर दिया.

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार का यह निर्णय वैधानिक नियमों के विपरीत है. अदालत ने कहा कि शासन द्वारा जारी प्रशासनिक परिपत्र कानून के तहत बनाए गए नियमों का स्थान नहीं ले सकते. यदि नियम किसी व्यक्ति को अधिकार प्रदान करते हैं तो प्रशासनिक आदेश या परिपत्र के माध्यम से उसे समाप्त नहीं किया जा सकता.

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि दिसंबर 2012 से प्रभावी मानते हुए याचिकाकर्ता को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मान निधि का लाभ दिया जाए. साथ ही उस अवधि की समस्त बकाया राशि की गणना कर 60 दिनों के भीतर भुगतान किया जाए. न्यायालय ने यह भी निर्देश दिए कि भविष्य में भी याचिकाकर्ता को नियमानुसार नियमित रूप से पेंशन का भुगतान सुनिश्चित किया जाए.

हाई कोर्ट के इस फैसले को स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों के अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यह निर्णय स्पष्ट करता है कि वैधानिक नियमों के तहत मिलने वाले अधिकारों को केवल प्रशासनिक परिपत्रों के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता और पात्र लाभार्थियों को उनका वैधानिक हक मिलना ही चाहिए.

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