रेगुलर होने से पहले नौकरी की पेंशन भी जुड़ेंगी, सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के हक में दिया फैसला

नई दिल्ली. किसी कर्मचारी को बाद में नियमित यानी रेगुलर कर दिया गया हो तो उसकी पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ तय करते समय केवल रेगुलर होने की तारीख को आधार नहीं बनाया जा सकता. नियमित होने से पहले की गई कॉन्ट्रैक्ट, एडहॉक, दैनिक वेतन या वर्क-चार्ज की सेवा को भी परिस्थितियों के अनुसार पेंशन के लिए पात्र सेवा में शामिल किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड से जुड़े मामले में यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है.

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड की अपील खारिज करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. हाई कोर्ट ने लंबे समय से काम कर रहे उन कर्मचारियों को पेंशन संबंधी लाभ देने का निर्देश दिया था, जिन्हें बाद में अगस्त 2004 में नियमित किया गया था.

वर्षों तक काम करने के बाद हुए थे रेगुलर
मामले में संबंधित कर्मचारियों की नियुक्तियां 1993 से 1996 के बीच क्लर्क और चपरासी के पदों पर हुई थीं. शुरुआत में उन्हें कॉन्ट्रैक्ट, एडहॉक, दैनिक वेतन और वर्क-चार्ज व्यवस्था के तहत काम पर रखा गया था. इनमें कई नियुक्तियां 89 दिनों की अवधि के लिए होती थीं.

समय के साथ कुछ कर्मचारियों को जूनियर असिस्टेंट और सीनियर असिस्टेंट के पद पर पदोन्नति भी मिली. हालांकि, उनकी सेवा व्यवस्था को लेकर लगातार विवाद चलता रहा. नौकरी समाप्त किए जाने, दोबारा नियुक्ति और नियमितीकरण को लेकर कर्मचारियों को कई बार कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी.

वर्ष 1995 में 224 एडहॉक क्लर्कों की सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं. इसके बाद इनमें से 184 कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट आधार पर फिर काम दिया गया. बाद में भर्ती प्रक्रिया भी शुरू हुई, लेकिन कर्मचारी अपनी सेवा जारी रखने और नियमित होने की मांग को लेकर अदालतों का दरवाजा खटखटाते रहे.

पेंशन की नई व्यवस्था से पैदा हुआ विवाद
मामले में पेंशन का विवाद इसलिए महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि एक जनवरी 2004 से नई परिभाषित अंशदायी पेंशन योजना लागू हुई थी. कर्मचारियों की सेवा इससे पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन उन्हें अगस्त 2004 में औपचारिक रूप से नियमित नियुक्ति पत्र दिए गए.

कर्मचारियों का कहना था कि उनकी वास्तविक सेवा नियमितीकरण से काफी पहले शुरू हो गई थी. इसलिए केवल अगस्त 2004 की तारीख को उनकी नियुक्ति की शुरुआत मानकर उन्हें नई पेंशन व्यवस्था में डालना उचित नहीं होगा.

दूसरी ओर पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड का तर्क था कि कर्मचारी अगस्त 2004 में नियमित नियुक्त हुए और इसी आधार पर उनकी पेंशन संबंधी स्थिति तय की जानी चाहिए.

बोर्ड ने कहा हम स्वायत्त संस्था हैं
सुप्रीम कोर्ट में बोर्ड की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड एक स्वायत्त संस्था है. इसलिए पंजाब सरकार द्वारा बनाई गई नियमितीकरण नीति उसे अपने आप लागू करने के लिए बाध्य नहीं करती थी.

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट पहले ही यह मान चुका था कि बोर्ड को सरकार की नियमितीकरण नीति अपनाने या नहीं अपनाने की स्वतंत्रता थी.

लेकिन बाद में बोर्ड ने स्वयं उस नीति को आवश्यक बदलावों के साथ अपनाने का निर्णय लिया. इसलिए नीति को अपनाने के बाद उससे निकलने वाले परिणामों को बोर्ड नजरअंदाज नहीं कर सकता.

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