इंदौर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु से ठीक पहले व्हाट्सएप संदेश के माध्यम से अपनी मौत के लिए जिम्मेदार लोगों के नाम लिखकर भेजता है, तो प्रारंभिक स्तर पर ऐसे संदेश को “मृत्युपूर्व कथन (डाइंग डिक्लेरेशन)” के रूप में माना जा सकता है. इसी आधार पर अदालत ने अनुसूचित जाति समुदाय के एक युवक को आत्महत्या के लिए कथित रूप से उकसाने के मामले में तीन आरोपियों को जमानत देने से इनकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है. न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रथम दृष्टया गंभीर और महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें इस चरण पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
Case Title: Dharmendra v State of Madhya Pradesh, Cr.A. NO. 5816/2026
मामला अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 14ए के तहत दायर आपराधिक अपील से संबंधित था. अपीलकर्ताओं ने 30 जून 2026 को पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें विशेष न्यायालय ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी. हाई कोर्ट ने मामले के उपलब्ध रिकॉर्ड और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद पाया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत से इनकार करने का निर्णय उचित और कानून सम्मत है.
प्रकरण के अनुसार बड़नगर थाना क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 194 के तहत संदिग्ध मृत्यु की सूचना मिलने पर पुलिस ने जांच शुरू की थी. जांच में सामने आया कि झारीपाड़ा गांव निवासी 25 वर्षीय संतोष, जो भील समुदाय से था, मृत अवस्था में मिला. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण दम घुटना (एस्फिक्सिया) बताया गया. जांच के दौरान मृतक के पिता और भाई ने आरोप लगाया कि खेती की जमीन को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद के कारण आरोपी लगातार संतोष को धमकाते थे, जातिसूचक गालियां देते थे, अपमानित करते थे और जान से मारने की धमकी देकर मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे. उनका कहना था कि लगातार हो रहे उत्पीड़न से परेशान होकर संतोष ने आत्महत्या कर ली.
अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में मृतक के मोबाइल फोन से संबंधित पंचनामा प्रस्तुत किया. जांच में यह पाया गया कि मौत से कुछ समय पहले संतोष ने अपने पिता के मोबाइल नंबर पर लगातार तीन व्हाट्सएप संदेश भेजे थे. इन संदेशों में उसने कथित रूप से उन लोगों के नाम लिखे थे, जिन्हें वह अपनी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार मान रहा था. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया यह इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मृत्युपूर्व कथन के रूप में महत्वपूर्ण महत्व रखता है, क्योंकि इसमें आरोपियों के नाम स्पष्ट रूप से दर्ज हैं और यह अभियोजन की कहानी को समर्थन देता है.


