जबलपुर/टीकमगढ़ ब्यूरो
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने टीकमगढ़ जिले से जुड़े एक राजस्व विवाद में न्यायालय के आदेशों की अवहेलना को गंभीर मानते हुए शासन-प्रशासन को कड़ा संदेश दिया है. अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि न्यायालय के आदेशों का पालन केवल अधीनस्थ अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि विभाग के शीर्ष अधिकारियों की भी उतनी ही जवाबदेही है. यदि किसी स्तर पर न्यायालय के आदेशों के पालन में लापरवाही होती है तो उसका उत्तरदायित्व तय किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर प्रमुख सचिव जैसे वरिष्ठ अधिकारियों को भी न्यायालय के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ेगा. हाई कोर्ट के सख्त रुख के बाद राजस्व विभाग के दो अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया, जबकि राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव संजय जैन को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होकर जवाब देना पड़ा.
यह मामला वर्ष 2022 में दायर एक अवमानना याचिका से जुड़ा है, जिसमें टीकमगढ़ जिले के राकेश एवं अन्य याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि हाई कोर्ट द्वारा 29 सितंबर 2021 को रिट याचिका क्रमांक 20794/2021 में पारित आदेश का पालन संबंधित अधिकारियों ने नहीं किया. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद राजस्व अभिलेखों में आवश्यक कार्रवाई नहीं की गई और आदेश को लंबे समय तक लंबित रखा गया. न्यायालय के आदेश की अनदेखी के चलते उन्हें अवमानना याचिका दायर करने के लिए विवश होना पड़ा.
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ में हुई. सुनवाई के दौरान अदालत ने न्यायालयीन आदेशों के पालन में लगातार हो रही देरी और प्रशासनिक लापरवाही को गंभीरता से लिया. अदालत के निर्देश पर राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव संजय जैन को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होना पड़ा. प्रमुख सचिव ने अदालत के समक्ष बिना शर्त क्षमा याचना प्रस्तुत करते हुए अतिरिक्त अनुपालन प्रतिवेदन भी दाखिल किया. उन्होंने न्यायालय को भरोसा दिलाया कि आदेश का पालन सुनिश्चित कर दिया गया है और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न नहीं होने दी जाएगी.
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ गुलाटी के साथ अधिवक्ता भानु प्रताप यादव ने पैरवी की, जबकि राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एच.एस. रूपराह तथा अधिवक्ता पीयूष जैन उपस्थित हुए. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने शासन से यह स्पष्ट करने को कहा कि आखिर न्यायालय के आदेश के पालन में इतना विलंब क्यों हुआ और इसके लिए कौन अधिकारी जिम्मेदार है.
सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने अदालत को बताया कि नायब तहसीलदार द्वारा 30 जून 2026 को पारित आदेश त्रुटिपूर्ण था. इसके बाद राजस्व मंडल के निर्देशों के अनुरूप एक जुलाई 2026 को नया आदेश जारी किया गया, जिसके माध्यम से याचिकाकर्ताओं के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज कर दिए गए हैं. शासन ने यह भी स्वीकार किया कि तहसीलदार, नायब तहसीलदार तथा एसडीएम स्तर पर हुई प्रशासनिक लापरवाही के कारण न्यायालय के आदेश के पालन में अनावश्यक विलंब हुआ. शासन ने अदालत को भरोसा दिलाया कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है.
राज्य सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि कलेक्टर टीकमगढ़ को पूरे मामले की जांच के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की समिति गठित करने के निर्देश दिए गए हैं. जांच के आधार पर प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर नायब तहसीलदार शिब्बू सिंह कसोरिया, लिधौरा तथा प्रभारी डिप्टी कलेक्टर एवं एसडीएम (राजस्व) जतारा संजय दुबे को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है. दोनों अधिकारियों के निलंबन संबंधी आदेश भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए. अदालत ने इन तथ्यों को रिकॉर्ड पर लेते हुए माना कि शासन ने दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई प्रारंभ कर दी है.
अपने आदेश में न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रमुख सचिव को इस प्रकरण में पक्षकार बनाए जाने का उद्देश्य केवल औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि विभाग का सर्वोच्च अधिकारी यह समझ सके कि उसके अधीनस्थ अधिकारी न्यायालय के आदेशों का किस प्रकार पालन कर रहे हैं. अदालत ने कहा कि यदि अधीनस्थ अधिकारी न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करेंगे तो विभाग के शीर्ष अधिकारियों को भी इसकी जवाबदेही से मुक्त नहीं माना जा सकता. प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही की श्रृंखला ऊपर तक जाती है और वरिष्ठ अधिकारियों का दायित्व है कि वे न्यायालयीन आदेशों का समयबद्ध और प्रभावी पालन सुनिश्चित करें.
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि अब जबकि आदेश का पालन कर दिया गया है, याचिकाकर्ताओं के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज हो चुके हैं तथा दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई भी प्रारंभ कर दी गई है, इसलिए अवमानना याचिका का निराकरण किया जाता है. हालांकि अदालत ने राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव को स्पष्ट निर्देश दिए कि भविष्य में न्यायालय के आदेशों का अक्षरशः, समयबद्ध और बिना किसी अनावश्यक विलंब के पालन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए. यदि भविष्य में इस प्रकार की लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध और अधिक कठोर कार्रवाई की जा सकती है.


