38 साल तक काम लेने के बाद नियुक्ति कैसे अवैध हो गई, नगर निगम को हाईकोर्ट की दो टूक फटकार

जबलपुर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने नगर निगम जबलपुर को कड़ी फटकार लगाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि जिन कर्मचारियों से संस्थान लगभग 38 वर्षों तक लगातार सेवाएं लेता रहा हो, उन्हें अब अवैध या अनियमित नियुक्ति का हवाला देकर अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने नगर निगम जबलपुर की अपील को निरस्त करते हुए कर्मचारियों के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है.

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें कर्मचारी स्वयं कार्यालय पहुंचकर दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करने लगे हों. उनकी नियुक्ति नगर निगम में कार्यरत तत्कालीन सक्षम अधिकारियों द्वारा की गई थी और वे करीब चार दशक से लगातार सेवाएं दे रहे हैं. ऐसे कर्मचारियों को वर्षों तक काम में लगाए रखने के बाद उन्हें नियमितीकरण के लाभ से वंचित करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता.

दरअसल, मामला अजय कुमार सहित अन्य कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 1986 में दैनिक वेतनभोगी के रूप में नियुक्त किया गया था. कर्मचारियों का आरोप था कि उनसे बाद में नियुक्त हुए कई कनिष्ठ कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया, जबकि उन्हें लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा. उन्होंने इसे पक्षपातपूर्ण रवैया बताते हुए न्यायालय की शरण ली थी.

मामले में पहले हाई कोर्ट की एकलपीठ ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनकी मांग स्वीकार कर ली थी. एकलपीठ ने नगर निगम को निर्देश दिए थे कि 16 मई 2007 की नियमितीकरण नीति और 29 सितंबर 2014 को जारी स्पष्टीकरण के अनुसार 60 दिनों के भीतर कर्मचारियों के नियमितीकरण पर निर्णय लिया जाए. इसी आदेश को चुनौती देते हुए नगर निगम जबलपुर ने युगलपीठ में अपील दायर की थी.

सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से अधिवक्ता जगत सिंह ने पक्ष रखा, जबकि अजय कुमार एवं अन्य कर्मचारियों की ओर से अधिवक्ता राजेश कुमार पांडे ने दलीलें प्रस्तुत कीं. कर्मचारियों की ओर से कहा गया कि वे लगभग 38 वर्षों से लगातार सेवा दे रहे हैं और नगर निगम उनकी सेवाओं का लाभ उठाता रहा है. इसके बावजूद उन्हें नियमित नियुक्ति का लाभ नहीं दिया गया, जबकि उनसे जूनियर कर्मचारियों को यह सुविधा मिल चुकी है.

युगलपीठ ने नगर निगम के तर्कों को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट किया कि इतने लंबे समय तक किसी कर्मचारी से कार्य लेने के बाद उसे अनियमित नियुक्ति का मामला बताना उचित नहीं है. अदालत ने कहा कि संस्थान द्वारा वर्षों तक सेवाएं लेने के बाद कर्मचारियों को अधिकारों से वंचित रखना शोषण की श्रेणी में आता है.

कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला केवल संबंधित कर्मचारियों के लिए ही नहीं, बल्कि लंबे समय से अस्थायी, दैनिक वेतनभोगी या अनियमित श्रेणी में कार्यरत हजारों कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है. अदालत के इस फैसले से यह संदेश गया है कि सरकारी संस्थान वर्षों तक कर्मचारियों से काम लेकर बाद में तकनीकी आधारों पर उनके अधिकारों से इनकार नहीं कर सकते.

हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद नगर निगम जबलपुर को अब कर्मचारियों के नियमितीकरण संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ानी पड़ सकती है. साथ ही यह फैसला उन सभी मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां कर्मचारी दशकों से सेवाएं दे रहे हैं लेकिन अब तक नियमित नियुक्ति और उससे जुड़े लाभों से वंचित हैं.

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