नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट बुधवार को निचली अदालतों पर आरोप तय करने में देरी को लेकर भड़क गया. कोर्ट ने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा, आरोपों का मसौदा तैयार करने में तीन से चार साल लग जाते हैं. यह क्या है. मैं गुजरात में अपना अनुभव साझा कर रहा था. हम जानते हैं कि कार्यप्रणाली क्या है. अदालत ने अमन कुमार नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणी की.
सुप्रीम कोर्ट ने ये संकेत दिया कि वो आपराधिक मुकदमों में आरोप तय करने के लिए निचली अदालतों से अपेक्षित समय-सीमा के बारे में दिशानिर्देश जारी कर सकता है ताकि मुकदमों में देरी को रोका जा सके. अदालत अमन कुमार द्वारा दायर जमानत याचिका पर विचार कर रही थी, जो अगस्त 2024 से डकैती और हत्या के प्रयास के एक मामले में विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में है. पुलिस ने इस मामले में 30 सितंबर, 2024 को आरोपपत्र दाखिल किया.
याचिकाकर्ता का यह था तर्क
ज़मानत याचिका में अमन कुमार ने तर्क दिया कि उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया है. उन्होंने आगे कहा कि पुलिस ने उन्हें अस्वीकार्य बयानों के आधार पर फंसाया है. एक निचली अदालत ने अक्टूबर 2024 में उनकी ज़मानत याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने पटना उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसने भी मार्च 2025 में उनकी ज़मानत याचिका खारिज कर दी. इसके बाद उन्होंने वर्तमान याचिका के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने जिन आधारों पर ज़मानत मांगी उनमें से एक यह था कि उन्हें विचाराधीन कैदी के रूप में अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता.
कोर्ट ने जताई आपत्ति
आज मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इस मामले में निचली अदालत द्वारा आरोप तय करने में की गई देरी पर कड़ी आपत्ति जताई. पीठ ने टिप्पणी की कि ऐसी स्थिति जारी नहीं रह सकती और पुलिस द्वारा आरोपपत्र या अंतिम जांच रिपोर्ट दाखिल होते ही आरोप तय किए जाने चाहिए. इसलिए, न्यायालय ने इस मुद्दे पर दिशानिर्देश जारी करने का प्रस्ताव रखा.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह क्या है? हम देखते हैं कि आरोपों का मसौदा तैयार करने में तीन से चार साल लग जाते हैं? यह क्या है? मैं गुजरात में अपना अनुभव साझा कर रहा था. हम जानते हैं कि कार्यप्रणाली क्या है. हम यहां साझा नहीं करना चाहेंगे, लेकिन मुकदमे में देरी नहीं की जा सकती. जैसे ही आरोपपत्र दाखिल होता है, आरोप तय होने चाहिए. कुछ लोगों को बरी किया जा सकता है, यह ठीक है. इस संबंध में दिशा निर्देश बनाने होंगे.











