51 साल पुराने 522 एकड़ जमीन मामले में मेनका गांधी को झटका, एमपी हाईकोर्ट ने खारिज की रिट अपील

जबलपुर. भोपाल की करीब 522 एकड़ पुश्तैनी जमीन से जुड़े लगभग 51 वर्ष पुराने पारिवारिक संपत्ति विवाद में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने वरिष्ठ राजनेता मेनका गांधी और उनकी बहन अंबिका शुक्ला को बड़ा झटका दिया है. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने दोनों की रिट अपील खारिज करते हुए वीएम सिंह के पक्ष में विवादित संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में नामांतरण (म्यूटेशन) का रास्ता साफ कर दिया. अदालत ने माना कि पारिवारिक समझौते के बाद अपीलकर्ताओं का संबंधित संपत्ति पर दावा समाप्त हो चुका था.

मामला भोपाल के बहेटा, बोरबन और लाऊखेड़ी क्षेत्र में स्थित लगभग 522 एकड़ भूमि से जुड़ा है. इस विवाद की शुरुआत वर्ष 1975 में दिल्ली हाई कोर्ट में दायर विभाजन वाद से हुई थी. बाद में परिवार के सदस्यों के बीच समझौता हुआ, जिसके आधार पर 25 अगस्त 1993 को दिल्ली हाई कोर्ट ने समझौता डिक्री पारित की. इस डिक्री को चुनौती दी गई, लेकिन वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा. इसके बावजूद भोपाल स्थित संपत्तियों के राजस्व अभिलेखों में नामांतरण को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुआ.

वीएम सिंह की ओर से अधिवक्ता उमेश त्रिपाठी ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल ने वर्ष 2020 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर समझौता डिक्री के आधार पर भोपाल की संपत्ति का नामांतरण कराने की मांग की थी. दूसरी ओर मेनका गांधी और अंबिका शुक्ला ने इस कार्रवाई पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्हें पक्षकार बनाए बिना नामांतरण की प्रक्रिया पूरी की गई. उनका तर्क था कि वे मूल पक्षकारों की कानूनी वारिस हैं, इसलिए उन्हें सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए था.

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पारिवारिक समझौते की शर्तों का विस्तृत परीक्षण किया. अदालत ने कहा कि संबंधित संपत्ति के संबंध में हुए समझौते के बाद अपीलकर्ताओं के अधिकार समाप्त हो चुके थे. इसलिए नामांतरण की कार्यवाही में उन्हें आवश्यक पक्षकार नहीं माना जा सकता. अदालत ने यह भी कहा कि राजस्व अधिकारियों द्वारा की गई नामांतरण की कार्रवाई समझौता डिक्री के अनुरूप थी.

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 32 की भी महत्वपूर्ण व्याख्या की. अदालत ने स्पष्ट किया कि यह धारा तहसीलदार को अपने पूर्व में पारित नामांतरण आदेश की समीक्षा करने की स्वतंत्र शक्ति प्रदान नहीं करती. हालांकि यदि कोई नया आधार या नया अधिकार उत्पन्न होता है, तो धारा 109 के तहत नया नामांतरण आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है. अदालत ने माना कि वीएम सिंह द्वारा प्रस्तुत आवेदन इसी श्रेणी का था और तहसीलदार द्वारा पारित नामांतरण आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या अवैधानिकता नहीं पाई गई.

सभी पक्षों की दलीलों और उपलब्ध अभिलेखों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने मेनका गांधी और अंबिका शुक्ला की रिट अपील खारिज कर दी. इसके साथ ही करीब पांच दशक से चले आ रहे इस बहुचर्चित पारिवारिक भूमि विवाद में वीएम सिंह के पक्ष में राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया. यह फैसला लंबे समय से लंबित पारिवारिक संपत्ति विवादों और समझौता डिक्री के प्रभाव को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है.

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