नई दिल्ली। कर्नाटक कैडर की दो वरिष्ठ महिला अधिकारियों के बीच वर्षों से चला आ रहा विवाद अब एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी डी. रूपा मौदगिल और भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी रोहिणी सिंधूरी के बीच शुरू हुआ यह विवाद फेसबुक पोस्ट से शुरू होकर मानहानि के मुकदमों, एक करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग और लंबी कानूनी लड़ाई तक पहुंच गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अधिकारियों को आपसी सहमति और मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने की सलाह दी है।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि दोनों अधिकारी अपने पेशेवर जीवन और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रही हैं। अदालत ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कुरियन जोसेफ को मध्यस्थ नियुक्त करते हुए दोनों पक्षों के बीच बातचीत के जरिए समाधान निकालने का प्रयास करने को कहा है।
इस विवाद की शुरुआत फरवरी 2023 में हुई थी। उस समय रोहिणी सिंधूरी को फेसबुक पर डी. रूपा मौदगिल द्वारा किए गए कुछ पोस्टों की जानकारी मिली। इन पोस्टों में कथित तौर पर आरोप लगाया गया था कि सिंधूरी ने अपनी निजी तस्वीरें अन्य आईएएस अधिकारियों के साथ साझा की थीं। सोशल मीडिया पर लगाए गए इन आरोपों ने जल्द ही सार्वजनिक विवाद का रूप ले लिया और दोनों अधिकारियों के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई।
मामला इतना बढ़ गया कि कर्नाटक सरकार को दोनों अधिकारियों का तबादला करना पड़ा। विवाद के बाद रोहिणी सिंधूरी ने डी. रूपा मौदगिल को कानूनी नोटिस भेजकर बिना शर्त माफी मांगने की मांग की और एक करोड़ रुपये के हर्जाने का दावा किया। उनका आरोप था कि सार्वजनिक रूप से लगाए गए आरोपों से उनकी प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुंची है और उन्हें मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा है।
इसके बाद मामला अदालत पहुंच गया। मार्च 2023 में बेंगलुरु की एक अदालत ने सिंधूरी द्वारा दायर आपराधिक मानहानि शिकायत पर संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की। डी. रूपा मौदगिल ने इस मामले को रद्द कराने के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए कहा कि आरोपों की जांच और सुनवाई आवश्यक है।
दिसंबर 2023 में मौदगिल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने वरिष्ठ अधिकारियों के बीच सार्वजनिक विवाद पर चिंता व्यक्त की थी। अदालत ने कहा था कि इस तरह के विवाद प्रशासनिक व्यवस्था और शासन प्रणाली पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने मानहानि मामले की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाई थी और दोनों अधिकारियों को मीडिया में बयान देने से भी परहेज करने का निर्देश दिया था।
हाल ही में फिर से सुनवाई के दौरान अदालत ने दोहराया कि यह विवाद अदालतों के बजाय बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि दोनों अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाएं दे चुकी हैं और उन्हें कानूनी संघर्ष जारी रखने के बजाय आपसी सम्मान और समझदारी से समाधान तलाशना चाहिए। अब सबकी नजरें मध्यस्थता प्रक्रिया पर टिकी हैं, जिससे इस लंबे विवाद के शांतिपूर्ण अंत की उम्मीद जताई जा रही है।










