नई दिल्ली.न्यायिक सेवा में प्रवेश की तैयारी कर रहे विधि स्नातकों के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया है. सिविल जज जूनियर डिवीजन की सीधी भर्ती के लिए मई 2025 में लागू की गई तीन वर्ष की अनिवार्य वकालत की शर्त में बदलाव करते हुए अदालत ने अब एक वर्ष की वास्तविक प्रैक्टिस को पर्याप्त माना है. हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल एक वर्ष की प्रैक्टिस के बाद सीधे नियमित न्यायिक पद पर कार्यभार नहीं संभाला जा सकेगा. चयनित अभ्यर्थियों को पहले एक वर्ष राज्य न्यायिक अकादमी में गहन प्रशिक्षण और उसके बाद एक वर्ष की संरचित विधि क्लर्कशिप पूरी करनी होगी.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बहुमत पीठ ने 21 अगस्त 2026 को यह फैसला सुनाया. न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने बहुमत के निष्कर्ष से असहमति जताई. उन्होंने तीन वर्ष की वकालत की शर्त को बनाए रखने के पक्ष में राय दी. सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला मई 2025 के उस निर्णय के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं और उससे जुड़े मामलों में आया है, जिसमें सिविल जज जूनियर डिवीजन की परीक्षा में बैठने के लिए कम से कम तीन वर्ष की बार प्रैक्टिस अनिवार्य की गई थी.
अदालत ने अपने नए निर्णय में मूल सिद्धांत को पूरी तरह खारिज नहीं किया है. पीठ ने साफ किया कि न्यायिक सेवा में प्रवेश करने वाले व्यक्ति को अदालत की कार्यप्रणाली, मुकदमों की वास्तविकता और न्यायिक प्रक्रिया की व्यावहारिक समझ होना जरूरी है. सवाल केवल इतना था कि यह अनुभव हासिल करने के लिए तीन वर्ष की पारंपरिक वकालत ही एकमात्र रास्ता हो सकती है या नहीं. अदालत ने माना कि न्यायिक प्रशिक्षण की बदलती व्यवस्था, न्यायिक अकादमियों की उपलब्धता और न्यायाधीशों के साथ संरचित क्लर्कशिप जैसे माध्यम भी व्यावहारिक अनुभव देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.


