रंजन न्यूज डॉटकॉम जबलपुर
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश के शासकीय महाविद्यालयों में कार्यरत गेस्ट लेक्चरर नियमित सरकारी कर्मचारियों के समान अतिरिक्त आकस्मिक अवकाश (कैजुअल लीव) पाने के हकदार नहीं हैं। अदालत ने कहा कि अतिथि व्याख्याता अस्थायी एवं आकस्मिक व्यवस्था के तहत नियुक्त किए जाते हैं, इसलिए उनकी सेवा शर्तें नियमित कर्मचारियों से अलग हैं। ऐसे में उन्हें नियमित सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले सभी लाभ देने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ गेस्ट लेक्चररों की याचिका खारिज कर दी।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त द्वारा पारित उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें गेस्ट लेक्चररों को सात दिन का अतिरिक्त आकस्मिक अवकाश देने की मांग अस्वीकार कर दी गई थी। न्यायालय ने कहा कि आयुक्त का आदेश लागू नियमों एवं शासन की नीति के अनुरूप है और उसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई।
मामला प्रदेश के गेस्ट लेक्चररों द्वारा दायर याचिका से संबंधित था। याचिकाकर्ताओं ने उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त के 22 अक्टूबर 2024 के आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 5 जुलाई 2023 को जारी परिपत्र के तहत महिला नियमित कर्मचारियों को पहले से मिलने वाले 13 दिन के आकस्मिक अवकाश के अतिरिक्त सात दिन का और आकस्मिक अवकाश देने का प्रावधान किया गया है। उनका तर्क था कि समान कार्य करने के कारण उन्हें भी यह सुविधा मिलनी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने इस संबंध में विभाग के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया था, लेकिन लंबे समय तक कोई निर्णय नहीं लिया गया। बाद में हाई कोर्ट के निर्देश पर उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त ने मामले पर विचार करते हुए उनकी मांग खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने आयुक्त के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि गेस्ट लेक्चरर नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं हैं। उनकी नियुक्ति अस्थायी एवं अतिथि व्यवस्था के तहत की जाती है और उनके लिए अलग सेवा नियम निर्धारित हैं। शासन द्वारा उन्हें पहले से ही 13 दिन का आकस्मिक अवकाश तथा तीन वैकल्पिक अवकाश की सुविधा प्रदान की जा रही है, लेकिन अतिरिक्त सात दिन का अवकाश देने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। इसलिए आयुक्त द्वारा नियमों के अनुरूप उचित निर्णय लिया गया है।


