जबलपुर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने प्रदेश की हजारों आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को बड़ी राहत देते हुए उनके मानदेय में की गई कटौती को अस्वीकार्य करार दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार द्वारा बढ़ाए गए आर्थिक अंशदान का लाभ सीधे पात्र कर्मियों तक पहुंचना चाहिए था. राज्य सरकार अपने हिस्से के अंशदान में कटौती कर केंद्र की अतिरिक्त सहायता का प्रभाव समाप्त नहीं कर सकती. हाई कोर्ट ने मानदेय बहाल रखने और बकाया राशि का भुगतान करने के आदेश को बरकरार रखा है. हालांकि, अदालत ने एकलपीठ के उस आदेश में संशोधन करते हुए बकाया राशि पर ब्याज देने के निर्देश को निरस्त कर दिया है. इस फैसले से राज्य सरकार को ब्याज के भुगतान से राहत मिली है, लेकिन प्रदेशभर की हजारों आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के मानदेय बहाली तथा एरियर भुगतान का अधिकार सुरक्षित रखा गया है.
यह महत्वपूर्ण फैसला हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बी.पी. शर्मा की युगलपीठ ने राज्य शासन द्वारा दायर अपील पर सुनवाई के बाद सुनाया. अदालत ने माना कि एकलपीठ द्वारा मानदेय बहाली और एरियर भुगतान का दिया गया आदेश पूरी तरह न्यायसंगत था. वहीं, ब्याज संबंधी निर्देश को संशोधित करते हुए कहा कि मूल याचिका में ब्याज की मांग के समर्थन में पर्याप्त कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया था. इसलिए बकाया राशि पर ब्याज देने का आदेश विधिसम्मत नहीं माना जा सकता.
मामला मप्र बुलंद आवाज नारी शक्ति आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व सहायिका संगठन, भोपाल द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है. संगठन की ओर से अदालत को बताया गया था कि केंद्र सरकार ने 27 जून 2019 से आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के लिए अपने वित्तीय अंशदान में वृद्धि की थी. केंद्र सरकार का उद्देश्य यह था कि प्रदेश की आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को अधिक मानदेय मिल सके तथा उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो. लेकिन राज्य सरकार ने अपने हिस्से के अंशदान में कटौती कर दी, जिससे केंद्र द्वारा बढ़ाई गई राशि का वास्तविक लाभ कर्मियों तक नहीं पहुंच सका. परिणामस्वरूप कुल मानदेय लगभग पहले के समान ही बना रहा.
याचिका में यह भी कहा गया था कि केंद्र सरकार की सहायता कर्मचारियों के हित में बढ़ाई गई थी, लेकिन राज्य सरकार ने अपने हिस्से की राशि घटाकर उस उद्देश्य को ही निष्प्रभावी बना दिया. इससे हजारों आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को वह आर्थिक लाभ नहीं मिल पाया, जिसके लिए केंद्र सरकार ने अतिरिक्त धनराशि उपलब्ध कराई थी. संगठन ने इसे कर्मचारियों के अधिकारों के साथ अन्याय बताते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की थी.
इस मामले में हाई कोर्ट की एकलपीठ ने तीन फरवरी 2026 को महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि 27 जून 2019 से पहले लागू व्यवस्था के अनुसार मानदेय बहाल किया जाए. साथ ही छह माह के भीतर सभी पात्र कर्मियों को ब्याज सहित एरियर का भुगतान करने के निर्देश भी दिए गए थे. राज्य सरकार ने इस आदेश को युगलपीठ में चुनौती देते हुए अपील दायर की थी. शासन की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने पक्ष रखा और ब्याज संबंधी आदेश पर आपत्ति जताई.
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद युगलपीठ ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा बढ़ाए गए अंशदान का उद्देश्य कर्मचारियों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ देना था. राज्य सरकार अपने हिस्से में कटौती कर उस उद्देश्य को समाप्त नहीं कर सकती. अदालत ने स्पष्ट किया कि कल्याणकारी योजनाओं में केंद्र और राज्य सरकार की वित्तीय भागीदारी का मूल उद्देश्य अंतिम लाभार्थियों तक अधिकतम लाभ पहुंचाना होता है. यदि केंद्र सरकार किसी योजना के लिए अतिरिक्त धन उपलब्ध कराती है तो उसका लाभ कर्मचारियों या लाभार्थियों तक पहुंचना चाहिए, न कि राज्य सरकार अपने वित्तीय दायित्व को कम करने के लिए उसका उपयोग करे.
अदालत ने यह भी माना कि एकलपीठ द्वारा मानदेय बहाली और एरियर भुगतान का दिया गया आदेश पूरी तरह उचित और न्यायसंगत है. इसलिए इस हिस्से में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है. हालांकि, ब्याज देने के संबंध में अदालत ने कहा कि मूल याचिका में ऐसा कोई ठोस वैधानिक या कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया था, जिसके आधार पर बकाया राशि पर ब्याज देने का निर्देश दिया जा सके. इसी कारण एकलपीठ के आदेश के उस हिस्से को संशोधित करते हुए ब्याज संबंधी निर्देश निरस्त कर दिए गए.
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को अपने पूर्व वित्तीय अंशदान की व्यवस्था बनाए रखनी होगी. इसका सीधा अर्थ यह है कि राज्य सरकार भविष्य में भी अपने हिस्से की राशि कम कर केंद्र सरकार द्वारा बढ़ाए गए अंशदान का लाभ समाप्त नहीं कर सकती. अदालत ने यह भी कहा कि पात्र आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को नियमानुसार ग्रेच्युटी का लाभ भी उपलब्ध कराया जाएगा. इस प्रकार अदालत ने कर्मचारियों के आर्थिक अधिकारों की रक्षा करते हुए उनके सेवा संबंधी हितों को भी संरक्षित रखा है.


