जबलपुर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने न्यायिक जवाबदेही और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि देश में कोई भी व्यक्ति, अधिकारी या प्रशासनिक व्यवस्था न्यायालय से ऊपर नहीं हो सकती. अदालत ने कहा कि न्यायिक आदेशों का पालन करना प्रत्येक प्राधिकरण की संवैधानिक जिम्मेदारी है और किसी भी स्तर पर निरंकुश कार्यप्रणाली को स्वीकार नहीं किया जा सकता. हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी अधिकारी ने स्वयं हलफनामा प्रस्तुत किया है तो उससे जुड़े प्रश्नों का उत्तर भी संबंधित अधिकारी को स्वयं ही देना होगा. केवल अधिवक्ता के माध्यम से स्पष्टीकरण देने या कार्यकाल समाप्त होने का हवाला देकर न्यायालय के समक्ष जवाबदेही से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर स्थित खंडपीठ ने आयकर अधिकारी सुधीर कुमार गुप्ता द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान की. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनीन्द्र कुमार सिंह की युगलपीठ कर रही थी. सुनवाई के दौरान अदालत ने न्यायिक अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि संविधान के तहत सभी संस्थाएं और अधिकारी न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह हैं तथा कोई भी पद या अधिकार न्यायालय से ऊपर नहीं हो सकता.
पूरा मामला भ्रष्टाचार से जुड़े एक प्रकरण में अभियोजन स्वीकृति को लेकर है. याचिकाकर्ता आयकर अधिकारी सुधीर कुमार गुप्ता ने अदालत में याचिका दायर कर उस अभियोजन स्वीकृति को चुनौती दी है, जिसके आधार पर उनके विरुद्ध कार्रवाई की जा रही है. याचिका में यह प्रश्न उठाया गया कि जब पहले सक्षम प्राधिकारी ने अभियोजन स्वीकृति देने से इनकार कर दिया था, तब बाद में बिना किसी नए साक्ष्य या अतिरिक्त सामग्री के अभियोजन स्वीकृति किस आधार पर प्रदान कर दी गई. इसी महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हाई कोर्ट ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के तत्कालीन चेयरमैन से विस्तृत हलफनामा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे.


