नई दिल्ली. देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था Supreme Court of India ने अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए तैयार किए गए फर्जी और अस्तित्वहीन न्यायिक फैसलों के हवाले दिए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है. न्यायालय ने इस प्रवृत्ति को एक “खतरनाक और तेजी से फैलता हुआ खतरा” करार देते हुए कहा कि यह न केवल न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है, बल्कि न्याय व्यवस्था की मूल आत्मा को भी कमजोर कर सकता है.
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति Rajesh Bindal और न्यायमूर्ति Vijay Bishnoi की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें यह सामने आया कि याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत तर्क और संदर्भ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स, विशेष रूप से ChatGPT के माध्यम से तैयार किए गए थे. इतना ही नहीं, उन दस्तावेजों में एक ऐसा न्यायिक फैसला भी उद्धृत किया गया था जिसका वास्तविक दुनिया में कोई अस्तित्व ही नहीं है.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस तथ्य को बेहद गंभीरता से लिया कि तकनीकी साधनों का उपयोग इस हद तक किया जा रहा है कि अदालत को गुमराह करने के प्रयास हो रहे हैं. पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि वकीलों और पक्षकारों द्वारा बिना सत्यापन के एआई द्वारा उत्पन्न सामग्री को अदालत में प्रस्तुत करना न्यायिक अनुशासन और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ है.
इससे पहले संबंधित मामले की सुनवाई कर रहे High Court of India ने भी अपने आदेश में इस बात का उल्लेख किया था कि अपीलकर्ता की ओर से दाखिल किए गए दस्तावेज और तर्क पूरी तरह से एआई आधारित थे. हाई कोर्ट ने विशेष रूप से यह इंगित किया कि जिस निर्णय का हवाला दिया गया था, उसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड या कानूनी आधार उपलब्ध नहीं है. इस टिप्पणी के बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान में आया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर में अदालतों के सामने एक नई चुनौती के रूप में उभर रही है. न्यायमूर्ति बिंदल और न्यायमूर्ति बिश्नोई ने कहा कि एआई एक उपयोगी उपकरण हो सकता है, लेकिन इसका दुरुपयोग न्यायिक प्रक्रिया को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की प्रथाओं पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो यह न्यायिक निर्णयों की विश्वसनीयता को संदेह के घेरे में ला सकता है.
पीठ ने यह भी कहा कि अदालत में पेश किए जाने वाले हर दस्तावेज और संदर्भ की सत्यता की जिम्मेदारी वकील और संबंधित पक्ष की होती है. केवल तकनीक के भरोसे बिना जांचे-परखे सामग्री को प्रस्तुत करना न केवल लापरवाही है, बल्कि न्यायालय के साथ धोखा करने जैसा है. अदालत ने संकेत दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें जुर्माना, पेशेवर अनुशासनात्मक कार्रवाई या अन्य दंडात्मक कदम शामिल हो सकते हैं.










