प्राइवेट स्कूलों में फीस और यूनिफॉर्म पर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, प्रशासनिक आदेश रद्द, स्कूल प्रबंधन को मिला अधिकार

रंजन न्यूज डॉटकॉम जबलपुर 

मध्य प्रदेश में निजी स्कूलों की फीस और यूनिफॉर्म को लेकर लंबे समय से चल रही खींचतान पर हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने न सिर्फ स्कूल प्रबंधन बल्कि अभिभावकों और प्रशासन—तीनों को नई बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है. जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य प्रशासन के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत निजी स्कूलों की फीस संरचना और यूनिफॉर्म से जुड़े नियम तय किए गए थे. अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि फीस और यूनिफॉर्म तय करना स्कूल प्रबंधन का अधिकार क्षेत्र है और इसमें प्रशासन की सीधी दखलअंदाजी कानूनन उचित नहीं ठहराई जा सकती.

यह मामला उस समय तूल पकड़ गया था जब राज्य सरकार ने निजी स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि और महंगी यूनिफॉर्म को लेकर एक आदेश जारी किया था. इस आदेश के तहत स्कूलों को फीस बढ़ाने से पहले प्रशासनिक अनुमति लेने, यूनिफॉर्म को एक तय विक्रेता तक सीमित न करने और अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न डालने जैसे निर्देश दिए गए थे. सरकार का तर्क था कि शिक्षा एक सेवा है, व्यवसाय नहीं, और अभिभावकों के हितों की रक्षा करना राज्य का दायित्व है. लेकिन निजी स्कूल प्रबंधन इस आदेश को अपने अधिकारों में हस्तक्षेप मानते हुए हाईकोर्ट पहुंच गए.
सुनवाई के दौरान स्कूल प्रबंधन की ओर से दलील दी गई कि संविधान उन्हें संस्थान चलाने की स्वतंत्रता देता है और फीस निर्धारण उसी स्वतंत्रता का हिस्सा है. उन्होंने कहा कि प्रशासन द्वारा तय किए गए नियम न केवल व्यावहारिक रूप से मुश्किल हैं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों के वेतन और संस्थान के संचालन पर भी सीधा असर डालते हैं. स्कूलों का यह भी कहना था कि यदि हर फैसले के लिए प्रशासनिक अनुमति अनिवार्य कर दी जाए, तो शिक्षा व्यवस्था नौकरशाही की जटिलताओं में फंसकर रह जाएगी.

हाईकोर्ट ने इन दलीलों पर गंभीरता से विचार करते हुए प्रशासन के आदेश को रद्द कर दिया. अदालत ने टिप्पणी की कि प्रशासन का यह रवैया “आपत्तिजनक” है और वह अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निजी संस्थानों के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है. कोर्ट ने कहा कि जब तक कोई स्कूल कानून का उल्लंघन नहीं कर रहा, तब तक फीस और यूनिफॉर्म जैसे विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार स्कूल प्रबंधन के पास ही रहना चाहिए.

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फीस निर्धारण पर पूर्ण स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि स्कूल मनमानी कर सकते हैं. यदि कहीं शोषण, धोखाधड़ी या कानून उल्लंघन की शिकायत सामने आती है, तो अभिभावकों और प्रशासन दोनों के पास कानूनी उपाय मौजूद हैं. लेकिन पहले से ही एक सामान्य आदेश जारी कर सभी निजी स्कूलों पर समान नियम थोपना संविधान और न्यायसंगत व्यवस्था के अनुरूप नहीं माना जा सकता.

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