एमपी में फिजूलखर्ची रोकने की पहल, अब नहीं बनेंगे स्वागत द्वार, बने तो नपेंगे अफसर

भोपाल। प्रदेश में अब नगर निगम व नगरीय निकाय स्वागत द्वार नहीं बनाएंगे। शासन ने शहरी क्षेत्रों में स्वागत द्वार बनाने पर रोक लगा दी गई है। इसके पीछे फिजूलखर्ची रोकने और निकायों की आर्थिक स्थिति सुधारने का तर्क दिया गया है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने नगरीय निकायों के सीएमओ को हिदायत दी है कि अब किसी ने स्वागत द्वार बनाया तो सस्पेंड कर दूंगा। दरअसल, प्रदेश के नगर निगमों व निकायों की माली हालत ठीक नहीं है। इससे उबरने के बजाय निकाय ऐसे निर्माण कार्य कर रहे हैं, जिनसे कोई आय नहीं होती है। इनमें स्वागत द्वार को फिजूलखर्ची का कार्य बताया गया है। अपर मुख्य सचिव ने निकायों को स्वागत द्वार बनाने के बजाय बुनियादी सुविधाओं, जैसे- सड़कों, नालियों और शुद्ध पेयजल आपूर्ति जैसी नागरिक सुविधाओं के विकास पर खर्च करने का निर्देश दिया है। हालांकि यह बात अलग है कि जनप्रतिनिधियों और नेताओं का जोर महापुरुषों के नाम पर स्वागत द्वार बनाए जाने पर रहता है। नगरीय निकाय के अधिकारियों के अनुसार, नगर पालिका या प्रमुख सड़कों पर बनने वाले कंक्रीट और पत्थर के मध्यम आकार के स्वागत द्वारों पर लगभग 15 लाख से 20 लाख तक का खर्च होता है। स्वागत द्वार में रेड सैंडस्टोन (लाल पत्थर) या अन्य नक्काशीदार पत्थर का उपयोग लागत बढ़ाता है। लोहे या साधारण कंक्रीट से बने छोटे से छोटे स्वागत द्वार की लागत भी 15 लाख रुपये तक आती है। इस राशि के व्यय से निकायों को आय नहीं होती। बड़े आकार के स्वागत द्वार बनाने में एक करोड़ से अधिक राशि व्यय होती है।

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