जबलपुर. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के मामलों में एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है जो आने वाले समय में कानूनी नजीर बनेगा. न्यायालय ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी है कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की गणना करते समय उसकी पत्नी की व्यक्तिगत कमाई या स्वतंत्र आय को पति की आय का हिस्सा नहीं माना जा सकता.
जस्टिस की एकलपीठ ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए कहा कि यदि पत्नी स्वयं आयकर दाता है और उसके पास अपनी आय के स्वतंत्र स्रोत मौजूद हैं तो उन संपत्तियों को पति की काली कमाई की श्रेणी में रखकर उन्हें जब्त या आरोपित नहीं किया जा सकता. यह फैसला एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान आया जिसमें एक सरकारी कर्मचारी पर लोकायुक्त पुलिस द्वारा आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया गया था और उसकी पत्नी के नाम पर मौजूद संपत्तियों को भी भ्रष्टाचार की कमाई का हिस्सा बताकर शामिल किया गया था.
अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में रेखांकित किया कि भारतीय कानून में पत्नी एक स्वतंत्र कानूनी इकाई है और उसे अपनी संपत्ति रखने तथा व्यवसाय करने का पूर्ण अधिकार है. यदि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहता है कि पत्नी के नाम खरीदी गई संपत्ति में पति का पैसा लगा है, तो मात्र पति-पत्नी के रिश्ते के आधार पर दोनों की आय को जोड़कर गणना करना विधि सम्मत नहीं है. कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जांच एजेंसियों को भ्रष्टाचार के मामलों में सूक्ष्मता से अंतर करना होगा कि कौन सी संपत्ति आरोपी के प्रभाव से बनाई गई है और कौन सी संपत्ति परिवार के अन्य सदस्यों ने अपनी मेहनत या विरासत से हासिल की है. इस फैसले से उन हजारों लोक सेवकों को राहत मिलने की उम्मीद है जिनके परिजनों की निजी संपत्तियों को भी जांच के दायरे में घसीट लिया जाता है.
यह निर्णय जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है. अक्सर देखा गया है कि आय से अधिक संपत्ति के छापों में जांच दल घर के सभी सदस्यों के गहने, बैंक बैलेंस और अचल संपत्तियों को एक ही खाते में जोड़ देते हैं, जिससे आरोपी की कुल संपत्ति उसकी आय के ज्ञात स्रोतों से कई गुना अधिक नजर आने लगती है. हाईकोर्ट ने अब इस प्रक्रिया पर लगाम लगा दी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी का अपना व्यवसाय है, वह नौकरीपेशा है या उसे पैतृक संपत्ति से कोई लाभ प्राप्त हो रहा है, तो उस पर उसका एकाधिकार है. कानून की नजर में पति और पत्नी दो अलग-अलग करदाता हो सकते हैं और उनकी वित्तीय स्वायत्तता का सम्मान किया जाना चाहिए.
इस मामले में बचाव पक्ष के तर्कों को स्वीकार करते हुए अदालत ने यह भी माना कि महिला सशक्तीकरण के दौर में महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं. ऐसे में उनके द्वारा अर्जित धन को केवल इसलिए संदिग्ध मान लेना कि उनका पति एक लोक सेवक है, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है. अभियोजन पक्ष को अब प्रत्येक संपत्ति के लिए यह ठोस प्रमाण पेश करना होगा कि उसका वास्तविक भुगतान पति की अवैध कमाई से किया गया था. बिना प्रमाण के किसी महिला की संपत्ति को उसके पति की ‘बेनामी’ संपत्ति या भ्रष्टाचार का फल नहीं कहा जा सकता.
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद अब लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू जैसी जांच एजेंसियों को अपनी चार्जशीट तैयार करते समय अधिक सावधानी बरतनी होगी. अब उन्हें पति और पत्नी के वित्तीय लेन-देन का पृथक ऑडिट करना होगा. यह निर्णय विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच बनेगा जो पेशेवर रूप से सक्रिय हैं और अपनी स्वतंत्र पहचान रखती हैं. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह रुख समाज में बदलती आर्थिक व्यवस्था और व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति न्यायपालिका की संवेदनशीलता को दर्शाता है. इस फैसले ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि भ्रष्टाचार की लड़ाई में किसी निर्दोष की मेहनत की कमाई को केवल रिश्तों के आधार पर बलि नहीं चढ़ाया जा सकता. अंततः यह आदेश व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.











