नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि वयस्क युवक-युवती के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को केवल रिश्ता टूटने के बाद दुष्कर्म का मामला नहीं माना जा सकता. शादी का वादा कर संबंध बनाने के आरोप से जुड़े एक मामले में अदालत ने आरोपी व्यक्ति को राहत देते हुए आरोपों से मुक्त कर दिया.
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि प्रेम संबंधों में आपसी सहमति से बने शारीरिक रिश्तों को ब्रेकअप के बाद आपराधिक रंग देना उचित नहीं है. हर टूटे हुए रिश्ते को दुष्कर्म के मामले में बदलना कानून का उद्देश्य नहीं हो सकता.
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा करके या धोखे से शारीरिक संबंध बनाए गए हों, तो मामला अलग होगा. ऐसे मामलों में यह जांचना जरूरी है कि सहमति वास्तव में स्वतंत्र थी या धोखे के आधार पर हासिल की गई थी.
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
1. रिश्ता खत्म करना अपराध नहीं: अदालत ने कहा कि केवल रिश्ता तोड़ने या शादी से इनकार करने के आधार पर किसी पुरुष के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज करना उचित नहीं है. किसी व्यक्ति को रेप केस की धमकी देकर जबरन रिश्ते में बने रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
2. कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए: किसी को परेशान करने या बदला लेने के लिए दुष्कर्म कानून का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. अदालत के मुताबिक, आपसी सहमति से बने संबंधों और शुरुआत से ही धोखे या जबरदस्ती से बनाए गए संबंधों के बीच अंतर समझना जरूरी है.
3. सबूतों के आधार पर हो फैसला: किसी भी मामले में आरोपों की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच जरूरी है. यौन हिंसा, जबरदस्ती या धोखाधड़ी के प्रमाण मिलने पर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.
4. महिलाओं की पीड़ा को भी समझना जरूरी: अदालत ने महिलाओं की सामाजिक परिस्थितियों और परेशानियों पर भी ध्यान दिलाया. कई महिलाएं परिवार की प्रतिष्ठा और सामाजिक बदनामी के डर से यौन हिंसा की शिकायत दर्ज कराने से हिचकती हैं. ऐसे मामलों में उनकी मुश्किलों और परिस्थितियों को भी संवेदनशीलता से समझना जरूरी है.








