प्रयागराज एजेंसी
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला; फर्जी डिग्री वाले 105 वकीलों पर FIR के आदेश, पुलिस वेरिफिकेशन और डिग्री के डिजिटल सत्यापन की भी सिफारिश
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के दागी और आपराधिक मामलों में नामजद अधिवक्ताओं को लेकर बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि जिन वकीलों के खिलाफ सात साल या उससे अधिक सजा वाले जघन्य अपराधों में मुकदमा दर्ज है, वे बेगुनाह साबित होने तक किसी भी अदालत में न तो वकालत कर सकेंगे और न ही बहस कर पाएंगे। इतना ही नहीं, ऐसे मामलों का ट्रायल उनके गृह जनपद से 100 किलोमीटर दूर किसी दूसरे जिले में कराया जाए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने इटावा के एक अधिवक्ता की याचिका पर 61 पृष्ठों का विस्तृत फैसला सुनाते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था में आपराधिक तत्वों की मौजूदगी केवल अदालतों की गरिमा को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि यह पूरे संस्थागत ढांचे और नैतिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा है।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब अधिकार और प्रभाव रखने वाले लोग अन्याय के सामने मूकदर्शक बने रहते हैं तो उसका नुकसान केवल पीड़ितों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी इसकी कीमत चुकाती हैं।
105 फर्जी डिग्रीधारी वकीलों पर FIR के आदेश
हाईकोर्ट ने यूपी बार काउंसिल के सचिव को निर्देश दिए हैं कि फर्जी डिग्री के आधार पर अधिवक्ता बने 105 लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी की एफआईआर दर्ज कराई जाए। साथ ही उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए।
पुलिस वेरिफिकेशन और डिजिटल सिस्टम की सिफारिश
कोर्ट ने भविष्य में अधिवक्ताओं के पंजीकरण के लिए पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य करने का सुझाव दिया है। साथ ही बार काउंसिल और विश्वविद्यालयों के बीच डिजिटल लिंक विकसित कर डिग्रियों का रियल-टाइम सत्यापन करने की व्यवस्था बनाने की भी सिफारिश की है।
20 अगस्त तक मांगी अनुपालन रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने निर्देशों के पालन की विस्तृत रिपोर्ट तलब करते हुए मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को तय की है।


