टीकमगढ़ जेल के कैदियों को मुनि श्री विकौशल सागर जी ने शराब एवं मांस का त्याग कराया

सुधीर जैन, टीकमगढ़ 

परम पूज्य गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य श्रमण मुनि श्री 108 विकौशल सागर जी महाराज ने आज टीकमगढ़ जेल में कैदियों तथा जेलर सहित सभी अधिकारियों को संबोधित किया तथा सभी कैदियों को शराब, मांस तथा आत्महत्या करने का भी त्याग कराया।
इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि वास्तव में आप जो दुख भोग रहे हो इसका कारण कोई और नहीं अपितु आप स्वयं ही हो। दूसरा व्यक्ति ना तो किसी को दुख दे सकता है ना ही सुख। एकमात्र स्वयं के कार्य व्यक्ति के भाग्य के निर्माता है वह अपने लिए अच्छा कार्य करके अच्छा भाग्य तथा बुरे कार्य करके दुर्भाग्य का निर्माण कर सकता है। अच्छे कार्यों से अच्छी उपलब्धियां जैसे आज्ञाकारी पुत्र,शीलवती पत्नी ,कुटुंब धन वैभव संपदा की प्राप्ति होती है तथा बुरे कार्यों से नरक गति एवं पशु गति के दुख भोगने पड़ते हैं इसीलिए बुराइयों को छोड़ना ही समझदारी है। बुराइयां यानी पाप कर्म – भगवान महावीर स्वामी ने हिंसा, झूठ, चोरी ,कुशील एवं परिग्रह इन्हें पाप कहा है अतः ऐसे कार्यों को छोड़कर अच्छे कार्यों में संलग्न होना चाहिए। मुनिश्री ने धर्म की परिभाषा बदलते हुए कहा कि वास्तव में जो स्वयं को खराब लगे उसे स्वप्न में भी दूसरों के लिए ना करना ना मन से ना वचन से ना क्रिया से, यह वास्तव में धर्म का प्रथम लक्षण है ऐसा शास्त्रों में उल्लेख है। संविधान में भी इन पांच पापों के आधारभूत नियमों की रचना की गई है। इस प्रकार यदि हम दुखों से बचना चाहते हैं तो पहले इन पांच पापों को छोड़ें।अंत में कैदियों ने मुनि श्री के प्रवचनों से प्रभावित होकर मांस,शराब तथा आत्महत्या का त्याग किया तदुपरांत जेलर साहब तथा अन्य अधिकारियों को जैन समाज के व्यक्तियों द्वारा सम्मानित किया गया। मुनिश्री के द्वारा उनके लिए साहित्य भी प्रदान किया गया तथा वहां की लाइब्रेरी के लिए भी परम पूज्य आचार्य श्री विराग सागर जी द्वारा रचित साहित्य प्रदान किया गया।
जेलर साहब ने प्रवचन के उपरांत संपूर्ण जेल का मुनि श्री के लिए निरीक्षण करवाया जिसमें पुस्तकालय, सिलाई सेंटर ,आरोग्यधाम हॉस्पिटल तथा भोजनालय आदि दिखलाए गए अंत में मुनिश्री को नमस्कार करके सभी ने उनका आभार प्रकट किया।

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