प्रोबेशन पीरियड के नाम पर कर्मचारियों के वेतन में कटौती करना कानूनन सही नहीं : एमपी हाईकोर्ट

जबलपुर. मध्यप्रदेश के हजारों सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है. जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि प्रोबेशन पीरियड के नाम पर कर्मचारियों के वेतन में कटौती करना कानूनन सही नहीं है. अदालत ने कहा है कि यदि कर्मचारियों से 100 प्रतिशत काम लिया जा रहा है तो उन्हें 100 प्रतिशत वेतन भी दिया जाना चाहिए. अदालत ने राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें नई भर्तियों के दौरान शुरुआती वर्षों में कम वेतन देने का प्रावधान किया गया था. इसके साथ ही कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि जिन कर्मचारियों के वेतन से इस आधार पर कटौती की गई है, उन्हें पूरी राशि एरियर सहित वापस की जाए.

यह महत्वपूर्ण फैसला जबलपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सुनाया, जिसमें जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस दीपक खोट शामिल थे. अदालत के सामने यह मामला एक रिट याचिका के माध्यम से आया था, जिसमें मध्यप्रदेश के विभिन्न विभागों में कार्यरत कर्मचारियों ने राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी उस सर्कुलर को चुनौती दी थी जिसके तहत नई भर्ती होने वाले कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि के दौरान पूर्ण वेतन देने के बजाय चरणबद्ध तरीके से कम वेतन दिया जाता था. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकार उनसे नियमित कर्मचारियों की तरह पूरा काम लेती है, लेकिन वेतन केवल आंशिक दिया जाता है, जो समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत का उल्लंघन है.

दरअसल सामान्य प्रशासन विभाग ने 12 दिसंबर 2019 को एक सर्कुलर जारी किया था. इस सर्कुलर के अनुसार राज्य सरकार की नई भर्तियों में चयनित कर्मचारियों को पहले वर्ष केवल 70 प्रतिशत वेतन, दूसरे वर्ष 80 प्रतिशत वेतन और तीसरे वर्ष 90 प्रतिशत वेतन देने का प्रावधान किया गया था. सरकार का तर्क था कि यह व्यवस्था प्रोबेशन अवधि की प्रकृति के अनुरूप है और इससे प्रशासनिक प्रक्रिया को सरल बनाने में मदद मिलती है. लेकिन कर्मचारियों और विभिन्न कर्मचारी संगठनों ने इस व्यवस्था का विरोध किया और इसे अनुचित तथा असंवैधानिक बताया.

रिट याचिका में यह भी कहा गया कि जब किसी कर्मचारी की नियुक्ति विधिवत चयन प्रक्रिया के बाद होती है और वह नियमित पद पर काम करता है, तो केवल प्रोबेशन के आधार पर उसके वेतन में कटौती करना न्यायसंगत नहीं है. याचिकाकर्ताओं ने यह भी दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता का अधिकार और समान अवसर का सिद्धांत लागू होता है, इसलिए समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाना चाहिए. यदि एक कर्मचारी वही कार्य कर रहा है जो स्थायी कर्मचारी कर रहे हैं, तो उसके वेतन में कटौती करना कानून के विरुद्ध है.

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