जबलपुर/भोपाल संवाददाता
.प्रदेश के करीब 5 लाख संविदा और आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के लिए आज का दिन एक नई सुबह लेकर आया है, जिसने वर्षों के उनके संघर्ष, अनिश्चितता और कानूनी लड़ाई को एक सुखद मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की उस अपील को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है, जिसमें 10 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके कर्मचारियों को नियमित किए जाने के आदेश को चुनौती दी गई थी। मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए स्पष्ट किया कि यह केवल कानूनी प्रावधानों का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़े वर्ग के भविष्य, उनके परिवारों की आजीविका और उनके मानवीय अधिकारों से जुड़ा हुआ एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में किसी भी प्रकार का स्थगन देने से साफ इनकार कर दिया और राज्य सरकार को सिंगल बेंच द्वारा दिए गए निर्देशों का तत्काल प्रभाव से पालन करने के लिए बाध्य किया है।
यह कानूनी प्रकरण मूल रूप से वर्ष 2009 के उन संविदा कर्मचारियों से जुड़ा है, जो विगत 16 वर्षों से लगातार अपनी सेवाएं पूरी निष्ठा के साथ दे रहे थे। इन कर्मचारियों का दर्द यह था कि वे नियमित कर्मचारियों के समान ही कंधे से कंधा मिलाकर काम करते रहे, लेकिन उन्हें न तो स्थायी कर्मचारियों जैसी वेतन सुरक्षा मिली और न ही अन्य वे लाभ, जो एक सरकारी सेवक का अधिकार होते हैं। न्यायालय में दायर याचिका में इन कर्मचारियों ने पुरजोर तरीके से यह पक्ष रखा था कि समान काम के बदले कम वेतन दिया जाना न केवल उनके प्रति अन्याय है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मिले समानता के अधिकार और सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। उनकी इस दलील को हाई कोर्ट ने न केवल सुना, बल्कि उसे पूरी तरह से स्वीकार करते हुए ऐतिहासिक न्याय किया है।
पूरे मामले की पृष्ठभूमि देखें तो जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने 9 अप्रैल 2026 को एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया था। उस आदेश में कोर्ट ने स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे कि जो भी संविदा कर्मी 10 वर्ष की निरंतर सेवा की पात्रता रखते हैं, उन्हें सामान्य प्रशासन विभाग की 7 अक्टूबर 2016 की नीति का लाभ दिया जाना अनिवार्य है। कोर्ट ने आगे यह भी कहा था कि जिस प्रकार दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को समय के साथ नियमित किया गया और उन्हें उचित वेतनमान, वार्षिक वेतन वृद्धि, भत्ते और अन्य सेवा सुरक्षा के लाभ प्रदान किए गए, उसी तर्ज पर संविदा और आउटसोर्सिंग कर्मियों को भी लाभ देना राज्य सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है। सरकार ने इस एकलपीठ के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी, लेकिन आज डिवीजन बेंच ने उस अपील को सिरे से खारिज कर दिया, जिससे सरकार का रुख अब रक्षात्मक हो गया है और उसे कोर्ट के निर्देशों का पालन करना ही होगा।
इस सुनवाई के दौरान संविदा कर्मचारियों की ओर से अधिवक्ता ओपी द्विवेदी ने अत्यंत प्रभावी ढंग से पैरवी की। उन्होंने कोर्ट के समक्ष उन तमाम विसंगतियों को रखा, जो इन कर्मचारियों को वर्षों से झेलनी पड़ रही थीं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि सरकार द्वारा संचालित विभिन्न विभागों में कार्यरत ये कर्मचारी किसी भी मायने में कमतर नहीं हैं, फिर भी उन्हें अस्थाई मानकर उनके अधिकारों का हनन किया जा रहा था। अधिवक्ता की इन दलीलों ने कोर्ट को पूरी तरह संतुष्ट किया और परिणामस्वरूप डिवीजन बेंच ने एकलपीठ के उस आदेश को पूरी तरह उचित और न्यायसंगत ठहराया। कोर्ट का यह फैसला न केवल उन कर्मचारियों के लिए राहत है, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था में भी एक बड़ा सुधार लाने वाला कदम साबित होगा, जहां योग्यता और निरंतरता को अंततः मान्यता मिली है।
इस फैसले का व्यापक असर पूरे प्रदेश में देखने को मिलेगा। मध्य प्रदेश के करीब 5 लाख संविदा और आउटसोर्स कर्मचारी इस फैसले के दायरे में आ रहे हैं, जो वर्षों से एक स्थायी भविष्य की बाट जोह रहे थे। बिजली विभाग से लेकर अन्य सरकारी विभागों तक में व्याप्त असंतोष और अनिश्चितता का माहौल अब खत्म होने की कगार पर है। याद हो कि हाल ही में इन कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर विभिन्न तरह के आंदोलन किए थे, जिसमें बजरंगबली को पत्र लिखने से लेकर सामूहिक यज्ञ-हवन तक शामिल थे। यह उनकी हताशा और व्यवस्था के प्रति उनके असंतोष को दर्शाता था, जिसे अब हाई कोर्ट के इस न्यायपूर्ण आदेश ने एक उम्मीद की किरण में बदल दिया है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो अब राज्य सरकार के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वह जल्द से जल्द अपनी नीति में संशोधन करे और पात्र कर्मचारियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू करे। इस फैसले के बाद प्रदेश भर के कर्मचारी संगठनों में जश्न का माहौल है, क्योंकि यह केवल एक कानूनी जीत नहीं है, बल्कि यह उनके उस स्वाभिमान की जीत है, जिसके लिए वे लंबे समय से लड़ाई लड़ रहे थे। हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य अब इन कर्मचारियों के भविष्य को लंबे समय तक अधर में नहीं लटका सकता। अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है, जिसे जल्द ही इस आदेश का क्रियान्वयन करते हुए इन 5 लाख कर्मचारियों को वह हक देना होगा, जिसका वे हकदार थे। यह फैसला आने वाले समय में अन्य राज्यों के लिए भी एक नजीर साबित हो सकता है, जहां संविदा कर्मियों का मुद्दा लंबे समय गरमा रहा है।









